Saturday, April 5, 2025

माँ का घर

                          माँ का घर


बरसो बीत गय उस घर से विदा हुए, 

नई दुनियां बसाए हुए, पर ना जाने किया बात है? 

शाम ढलते ही मन उस घर पहुंच जाता है ,माँ की आवाज सुनने को मन आज भी तरस्ता है ,

महेक माँ के खाने की ,आज भी दिल भरमाती है ,शाम होते ही याद आता है,

घर मे हसी वा शोर का होना पापा का काम से, लोट कर आते ही, चाये का पियाला पीना, दिन भर का हाल सुनना, 

वो दिन बीत गए अब तुम सपने मे जी लिया करो, उन पलो को, जो लोट कर फिर कभी ना आएगे, 

आज भी माँ से किए वादे को निभाती हु, 

सबको खुश रखने की अथक कोशिश मे, 

अपने आसु पी जाती हू, कोइ केह दे मेरे रब से, या तो शाम ना ढला करे 

या मा की असहनिय याद ना अया करे, बहूत खुश हैं हम, अपनी इस दुनिया में बिन मानगे सब 

पाया है 

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